श्री विजय पुरम (अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह), 6 जून, 2026: विश्व पर्यावरण दिवस के विशेष अवसर पर फिशरी सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) के परिसर में “जलवायु परिवर्तन एवं समुद्री मत्स्यिकी” विषय पर एक महत्वपूर्ण जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में आईसीएआर-केंद्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईएआरआई), राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी), गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), मछुआरों, कॉलेज के छात्रों और स्थानीय समुदायों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. एम. मुरुगानंदम (प्रधान वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष, मत्स्य विज्ञान प्रभाग, आईसीएआर-सीआईएआरआई) ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर भारत और वैश्विक स्तर पर मत्स्य संसाधनों पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि:
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का एक बड़ा हिस्सा हमारे महासागर अवशोषित कर रहे हैं।
इसके परिणामस्वरूप समुद्री जल का तापमान बढ़ना, समुद्र-स्तर में वृद्धि, महासागरीय परिसंचरण पैटर्न में बदलाव और महासागरों का अम्लीकरण (acidification) जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं।
इन बदलावों के कारण मछलियों की वृद्धि, प्रजनन, प्रवास (migration), जीवित रहने की क्षमता और पूरी प्रजातीय संरचना पर व्यापक असर पड़ रहा है, जिससे मछुआरा समुदायों की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है।
डॉ. मुरुगानंदम ने प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ), समुद्री घास क्षेत्रों और मैंग्रोव वनों की संवेदनशीलता पर विशेष चिंता व्यक्त की। ये पारितंत्र समुद्री जीवों के लिए प्रजनन और नर्सरी क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं। इनके नष्ट होने से जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों की दीर्घकालिक स्थिरता को बड़ा खतरा है।
मछुआरों के साथ हुए संवाद का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन का असर अब जमीनी स्तर पर साफ दिखने लगा है।
एक चौंकाने वाला बदलाव: मछुआरों के अनुसार, अब ‘मत्स्य बंदी अवधि’ (Fishing Ban Period) के दौरान व्यावसायिक रूप से उपयोगी बड़ी मछलियां अधिक मिल रही हैं, जबकि सक्रिय मछली पकड़ने के सीजन में छोटी (किशोर) और प्रजननक्षम मछलियां जाल में आ रही हैं।
इस बदलते रुझान को देखते हुए डॉ. मुरुगानंदम ने सुझाव दिया कि वर्तमान मत्स्य स्टॉक के आधार पर मत्स्य बंदी अवधि (Fishing Holiday Schedules) और प्रबंधन रणनीतियों की वैज्ञानिक समीक्षा की जानी बेहद जरूरी है।
कार्यक्रम की शुरुआत में एफएसआई के मरीन मैकेनिकल इंजीनियर श्री बालानायक ने सभी का स्वागत किया और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया। वहीं एफएसआई के मत्स्य वैज्ञानिक डॉ. सी. बाबू ने पर्यावरणीय स्वास्थ्य और मत्स्य उत्पादन के अंतर्संबंधों को समझाया।
विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि सतत विकास के लिए आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। नीतियों और प्रौद्योगिकियों में पर्यावरण संबंधी चिंताओं को शामिल करके ही तटीय समुदायों की आजीविका को सुरक्षित किया जा सकता है।
इस कार्यक्रम में पांडिचेरी यूनिवर्सिटी के छात्रों और एनआईओटी के विशेषज्ञों सहित लगभग 40 प्रतिभागियों ने भाग लिया और अंत में एक संवादात्मक प्रश्नोत्तर सत्र के साथ कार्यक्रम का सफल समापन हुआ।



