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देहरादून का ‘बीहड़’ जैसा इलाका: व्यवस्था की बेरुखी पर ग्राउंड रिपोर्ट

Gaurav Mishra
Last updated: June 12, 2026 2:55 pm
Gaurav Mishra
Published: June 12, 2026
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Dehradun Rural Development Issues: गौरव मिश्रा/ राजेश पांडेय, 12 जून, 2026ः देहरादून की दूरस्थ ग्राम पंचायत क्यारा के मजरे खोली डबराना की सांसें फुलाने वाली चढ़ाई पर 58 साल के कुंदन सिंह रावत कहते हैं, “हमारी कई पीढ़ियां इस रास्ते पर चढ़ते उतरते बीत गईं, लगभग दो सौ साल पहले हमारे पूर्वज यहां बसे होंगे। मेरे पिता जी मुझसे कहते थे, हमारे समय तो शायद नहीं, पर तुम्हारे समय में क्यारा से गांव तक सड़क पहुंच जाएगी। मैं भी इतनी उम्र का हो गया, मेरा बेटा 35 साल का हो गया। मुझे लगता है कि मेरे सामने भी यह सड़क नहीं बन पाएगी। पर, उम्मीद रखने में क्या जाता है। उम्मीद के सहारे ही तो इतना जीवन यहां गुजार दिया। नई पीढ़ी तो यहां गांव में मुश्किल से ही रहेगी।”

कुंदन सिंह क्यारा ग्राम पंचायत में क्यारा से अपने गांव तक सड़क बनने का सपना बचपन से देख रहे हैं, पर यहां तो देहरादून से उनके गांव को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग भी ऊबड़ खाबड़ है। क्यारा ग्राम पंचायत  देहरादून शहर से लगभग 40 किमी. दूर है, पर यहां तक मुख्य मार्ग से पहुंचना आसान नहीं है। मालदेवता से लगभग 25 किमी. का मुख्यमार्ग कहीं कहीं ही चलने लायक है। पूरे रास्ते आपको रोड़ी पथरी पर चलना होगा। हर वाहन धूल उड़ाता हआ चलता है। बाइक के लिए यहां सबसे ज्यादा खतरनाक और शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ने वाला रास्ता है। चौड़ा मार्ग है, पर खतरनाक भी। अगर स्पष्ट शब्दों में कहूं तो यह देहरादून का ‘बीहड़’ है। ‘बीहड़’ से मतलब परेशानियों से है, जोखिम से है और हरपल सामने चुनौतियों से हैं।

मालदेवता- क्यारा- सिल्ला मार्ग पर इन दिनों चल रहा है मरम्मत कार्य।

Dehradun Rural Development Issues: एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई में बांदल नदी है। बांदल पार टिहरी गढ़वाल के पहाड़ और तलहटी में बसे गांव और समृद्ध सीढ़ीदार खेतीबाड़ी के नजारे बेहद शानदार हैं। पर, आप किसी सुरक्षित जगह गाड़ी खड़ी करके ही इन नजारों का लुत्फ लें। वैसे तो पूरे रास्ते पत्थरों, चट्टानों से सामना होता है। इस मार्ग पर इन दिनों कई जगह पुश्ते बनाने, पानी गिरने वाली जगहों पर पक्का करने, गदेरों, खालों वाली जगह मार्ग को दुरुस्त करने का काम चल रहा है। यह बात उम्मीद जगाती है कि “यह सबकुछ सड़क बनाने की तैयारी है।”

आपकी जानकारी के लिए बता दूं, मालदेवता से लगभग 15 किमी. आगे क्यारा और सिल्ला के रास्ते अलग हो जाते हैं। क्यारा के लिए नीचे उतरना पड़ता और सिल्ला के लिए आगे इसी मार्ग पर बढ़ जाइए। पर, किसी भी रूट पर इस मार्ग की हालत में कोई सुधार नहीं दिखता।

देखें वीडियोः 

मालदेवता से सिल्ला और क्यारा तक कई गांव, जिनमें घुंतु का सेरा, डोमकोट, छोटी छमरोली, छमरोली, फुलेत, सिमयारी आदि शामिल हैं, सब इस सड़क पर निर्भर हैं। फुलेत के रहने वाले करीब 56 साल के प्रेमदत्त ममगाईं खच्चर से सामान ढोते हैं। बताते हैं, यह रोड 2006 में बनी थी। वर्ष 2013 में आपदा में सड़क खराब हो गई। 2019 और फिर सितंबर 2025 की आपदा ने स्थिति बहुत खराब कर दी। तब से लेकर आज तक यह नहीं बन पाई। तब से ऐसे ही चल रहा है।

अगर, बांदल नदी का पुल, जो टिहरी गढ़वाल से जोड़ता है, से आगे सरखेत की बात करें, तो कई जगह रास्ता नदी से होकर ही है। रेतबजरी से भरा रास्ता बहुत खराब है। पर, गर्मियों में यह बड़ी संख्या में लोगों से गुलजार रहता है। नदी में बंधे बनाकर पिकनिक स्पॉट बना दिए गए हैं। नदी को जितना प्रदूषित किया जा सकता है, करने मेंं कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही। ग्रामीण बताते हैं, खाने पीने का सामान, कांच की बोतलें, पॉलिथीन बैग्स फेंककर इसे कचराघर बनाया  जा रहा है।

देहरादून से लगभग 40 किमी. दूर क्यारा ग्राम पंचायत के खोली डबराना गांव का रास्ता।

आइए फिर से लौटते हैं, हम 07 जून, 2026 को क्यारा से खोली डबराना गांव तक जाने वाले रास्ते पर थे। क्यारा से गांव तक सीधी चढ़ाई है। कहीं-कहीं आपको राहत मिलती है। रास्ते में जंगली खाला दिखता है, जो बरसात में दहशत फैलाता है। पत्थरों को काटकर बनाया रास्ता बारिश में फिसल भरा है। ग्रामीण कुंदन सिंह रावत बताते हैं, बारिश के दिनों में हर समय जोखिम रहता है। गांव में कोई स्कूल और आंगनबाड़ी नहीं है, इसलिए बच्चे पांचवी क्लास तक क्यारा और छठीं से 12वीं तक भगद्वारीखाल स्थित राजकीय इंटर कॉलेज जाते हैं। कुंदन सिंह की नातिन वैष्णवी तीन साल की हो गई, पर उसके लिए आंगनवाड़ी नहीं है।

Dehradun Rural Development Issues: खोली डबराना से वापस आते समय रास्ते में हमें सुचिता मिलीं, जिन्होंने एक साल पहले ही हाईस्कूल किया है। सुचिता देहरादून में रह रहीं अपनी बहन और भांजियों को लेने क्यारा गांव जा रही थीं। सुचिता बताती हैं, खोली डबराना से क्यारा तक जाने और आने की लगभग छह किमी. की दौड़ हमारी दिनचर्या में शामिल है। पहाड़ में पहाड़ जैसा जीवन जीना पड़ता है। वो कहती हैं, पहाड़ की महिलाओं और बेटियों को ‘झांसी की रानी’ बनकर रहना पड़ता है। अभी बारहवीं की पढ़ाई करने का मन नहीं है। बड़ी संख्या में बच्चे भगद्वारी खाल के इंटर कॉलेज में जाते हैं, कुल मिलाकर रोजाना 14 किमी. पैदल चलते हैं। इस रास्ते में जंगली जानवरों का भी खतरा है, पर शुक्र है मुझे कभी कोई जंगली जानवर नहीं दिखा। दुर्गम गांवों में रहने वाले बच्चे अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए बहुत चुनौतियों का सामना करते हैं। शिक्षा के लिए संघर्ष करने के बावजूद इन बच्चों के पास शहरों की तुलना में करिअर संबंधी सलाह पाने के ज्यादा अवसर नहीं होते। बेटियां दसवीं-बारहवीं के बाद शिक्षा नहीं पातीं। इसकी वजह उनके घर से स्कूल-कॉलेज ज्यादा दूर होना भी एक बड़ी वजह है। इसी तरह रुद्रप्रयाग जिले के ऊंचाई वाले एक गांव में 12वीं पास मेधावी छात्रा ग्रेजुएशन के लिए कॉलेज इसलिए नहीं जा पा रही थी, क्योंकि उनका कॉलेज घर से लगभग 22 किमी. दूर था। रोजाना कॉलेज जाने के लिए परिवहन किराया उनके लिए काफी खर्चा था। हमने उनको ओपन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई जारी रखने को कहा।  दुर्गम गांवों में युवाओं को करिअर संबंधी जानकारियां मुश्किल से मिल पाती हैं। इस दिशा में कार्य होने की बहुत गुंजाइश है।

क्यारा ग्राम पंचायत के खोली डबराना गांव निवासी खच्चर संचालक सोबन सिंह।

Dehradun Rural Development Issues: खोली डबराना के रहने वाले सोबन सिंह खच्चरों से सामान ढोते हैं, कुछ खेती, बकरियां और दो खच्चरों से उनकी आजीविका चलती है। सोबन सुबह चार बजे घर से खच्चर लेकर उबड़खाबड़ ढलान वाले रास्ते से होते हुए क्यारा की ओर चलते हैं। गर्मियों में दोपहर तक कामकाज निपटाकर क्यारा से घर की ओर वापसी करते हैं। खच्चरों पर प्रतिदिन का खर्चा पूछने पर कहते हैं, एक खच्चर को कम से कम दो किलो चना खिलाते हैं। खाएगा नहीं तो इसमें सामान ढोने की ताकत कहां से आएगी। एक खच्चर पर ढाई से तीन सौ रुपये खर्चा आता है। बताते हैं, एक खच्चर अधिक से अधिक लगभग 80 किलो तक बोझा उठा लेता है। दिन में खच्चर के खाने का खर्चा निकल जाए तो भी सब्र होता है। रोजाना काम नहीं मिलता, किसी दिन तो खच्चर पर होने वाला खर्चा भी नहीं कमा पाते। खोली डोबराना तक सामान पहुंचाने का भाड़ा लगभग 500 रुपया है।

सोबन गांव जाने के लिए हमारा इंतजार कर रहे थे, पर हमने खच्चर पर बैठकर गांव तक जाने से मना कर दिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि हम कठिन रास्ते पर चलने में होने वाली मुश्किलों को महसूस करना चाहते थेै। वास्तव में यह खड़ी और कठोर परीक्षा लेने वाली चढ़ाई है, जो कई बार रुक रुक कर पूरी की।

देखें वीडियोः 

Dehradun Rural Development Issues: कुंदन सिंह बताते हैं, हमारे पर महंगाई की दोहरी मार है। पहले देहरादून से क्यारा तक सामान पहुंचाने का परिवहन चार्ज और फिर क्यारा से घर तक सामान पहुंचाने के लिए खच्चर का भाड़ा, यह दुखद स्थिति है। सड़क बन गई, भले ही दोपहिया लायक ही सड़क बन जाए, हमें मुसीबतें तो नहीं झेलनी पड़ेंगी। अगर, हम तीन हजार रुपये का राशन खरीदते हैं तो वो हमें घर तक साढ़े तीन हजार का पड़ता है। गैस का सिलेंडर घर तक आते आते महंगा हो जाता है। हमारे खेत की फसल बाजार तक पहुंचते पहुंचते महंगी हो जाती है, पर उसका लाभ हमें नहीं मिलता, क्योंकि फसल का रेट मंडी तय करती है,वहां यह ध्यान नहीं रखा जाता कि कितना भाड़ा देकर किसान वहां पहुंच रहा है।

मालदेवता से क्यारा- सिल्ला मार्ग के गांव नगदी फसलों के उत्पादन के गढ़ हैं। बांदल घाटी में इस दिनों अदरक बोई जा रही है और धनिया काटा जा रहा है। यहां आलू, बीन्स, प्याज, टमाटर, मटर सहित कई फसलें होती हैं। ऊंचाई पर मौजूद डबराना खोली के खेतों में अदरक बोई जा चुकी थी। वहीं, कुछ खेतों में धनिया काटा जा रहा था। किसान कुंदन सिंह बताते हैं, यहां सिंचाई की व्यवस्था नहीं है। वर्षा होने पर ही खेत सींचे जाते हैं। उनके मकान में रैन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रबंध किया गया है। बारिश का पानी सीधे टैंकों में जमा होता है, जिसका उपयोग पशुओं और खेती को सींचने में करते हैं। उनके घर के ठीक सामने ऊंचाई पर सोबन सिंह का घर है। उनके घर के सामने खेत में प्लास्टिक शीट का वाटर टैंक है, इसमें भी बारिश का पानी इकट्ठा होता है। बारिश समय पर होने से ही फसल अच्छी होती है। बड़ी मुश्किलों से फसल को क्यारा तक पहुंचाया जाता है, जहां से लोडर में रखकर उपज देहरादून मंडी जाती है।

देखें वीडियोः 

खेतों में समृद्धि है, पर क्या यह किसानों के लिए भी उतना ही फायदे का सौदा है। क्यारा से लगभग 20 किमी. पहले ही घन्तू का सेरा निवासी किसान उर्मिला पंवार बताती हैं, यहां से उपज लोडर से देहरादून मंडी में जाती है। कई लोग एजेंट के जरिये उपज बाजार में भेजते हैं और कुछ लोग खुद मंडी जाकर बिक्री करते हैं। यही बात क्यारा- सिल्ला मार्ग के किसानों के साथ भी है। परिवहन भाड़ा इतना अधिक हो जाता है कि मंडी तक उपज का दाम बढ़ जाता है, जिसे किसान को वहन करना होता है। किसान को उपज का रेट तय करने का अधिकार नहीं है, रेट मंडी निर्धारित करती है। परिवहन, श्रम, लागत निकालकर किसान को बहुत ज्यादा लाभ नहीं मिलता। वहीं, यहां से देहरादून को जोड़ने वाला मुख्य मार्ग बहुत खराब स्थिति में है। कुल मिलाकर समृद्ध खेती से किसान को समृद्ध करने के लिए बेहतर मार्केट लिंकेज की आवश्यकता है।

देखें वीडियोः 

Dehradun Rural Development Issues: सोबन सिंह बताते हैं, उनके सामने सड़क के साथ पेयजल की भी बड़ी समस्या है। जब पानी नहीं आता, उनको रास्ते में मौजूद अखोड़ी स्थित स्रोत से पानी लाना पड़ता है। कुंदन सिंह बताते हैं, यहां बुरांसखंडा और धनोल्टी के नीचे ग्वाड़ से दो योजनाओं की लाइनें हैं। पानी इसलिए कम आता है और कई दिन तो नहीं भी आता, क्योंकि ऊंचाई पर स्थित गांवों तक ही पानी पूरा हो जाता है। हमारे तीन-चार घर सबसे बाद में हैं, इसलिए भी यहां दिक्कत बड़ी है। कुंदन सिंह के घर से थोड़ा नीचे गुलाब सिंह रहते हैं, उन्होंने भी पानी के संकट की समस्या बताई। कहते हैं, अखोड़ी से पानी ढोना पड़ता है। सबसे नीचे स्थित घर रणवीर सिंह का है। रणवीर सिंह हमारे साथ अखोड़ी में पानी भरने जाते हैं। बताते हैं, तिनके की मोटाई के समान पानी की धार नल में आ रही है।

खोली डोबराना से वापस लौटते वक्त हमें ढलान पर बहुत संभलकर पैर रखने पड़े। कई जगह तीखा ढलान, जिस पर बजरी मिट्टी फिसलन पैदा कर रहे थे। रास्ते में ग्रामीण बकरियां चराते मिले, जिनमें बच्चे भी शामिल थे। बच्चे स्कूल से आने के बाद घर के कामकाज में हाथ बंटाने के लिए बकरियां चराने निकल पड़ते हैं। वहीं, सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बिटिया, जो क्यारा गांव में रहती है, पशुओं के नीचे बिछाने के लिए सूखी पत्तियां इकट्ठा कर रही थी। वो ऊंचाई पर थी।

सुचिता बताती है, सूखी पत्तियां पशुओं के बिछोने का काम करती हैं। वहीं दो महिलाएं पशुओं के चारे के लिए घास काट रही थीं। खेती और पशुपालन इन गांवों की आजीविका के स्रोत हैं। करीब 56 साल के गुलाब सिंह बकरियां लेकर गांव से करीब डेढ़ किमी. नीचे पहुंचे हुए थे। बताते हैं, बकरी पालन में बहुत मेहनत है, पर ये आय का अच्छा जरिया भी हैं। पूरा दिन इनके साथ बीतता है। वहीं गांव से युवा नौकरी पेशे के लिए देहरादून शहर चले गए। महीने-दो महीने में ही घर आते हैं। ग्रामीण कहते हैं, सड़क बन जाती तो देहरादून से रोजाना नहीं तो एक हफ्ते में तो आना जाना हो जाता। इसी तरह की भौगोलिक परिस्थितियों वाले गांव डोमकोट के विशाल कठैत अपने बच्चों के साथ देहरादून के रायपुर में रहते हैं। उन्होंने अपनी बिटिया का रायपुर के ही एक स्कूल में एडमिशन भी करा दिया। उनका कहना है, गांव में आंगनवाड़ी तक नहीं है, बच्चों की पढ़ाई और रोजगार के लिए घर छोड़ना पड़ा। अब तीन से छह माह में गांव आता हूं।

खोली डबराना से लौटते वक्त, जब हमें देहरादून से क्यारा का मुख्यमार्ग दिखा, तब हमने राहत की सांस ली।

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